“मज़दूर कोई बिकाऊ वस्तु नहीं है” लेकिन पीस रेट वेतन, कोटा और डर का दबाव यह सुनिश्चित करता है।

“मज़दूर कोई बिकाऊ वस्तु नहीं है” लेकिन पीस रेट वेतन, कोटा और डर का दबाव यह सुनिश्चित करता है।

10 मई 1944 को अपनाई गई फिलाडेल्फिया घोषणा ने 1919 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के लक्ष्यों और उद्देश्यों की पुष्टि की और परिभाषित किया। उसका सबसे पहल अनुछेद कहता हैं:
() मज़दूर कोई बिकाऊ वस्तु नहीं है;

यह घोषणा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ पर आई, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे कई देशों के लिए उपनिवेशवाद के अंत की शुरुआत को चिह्नित करते हुए। कई नए स्वतंत्र देशों में उपनिवेशवाद के अवशेष भाषा, शिक्षा, कानून, सीमाओं, भूमि के स्वामित्व और साथ ही शासन की संरचनाओं में जारी रहेंगे। औपनिवेशिक प्रथाएं नस्लवाद, भेदभाव, गुलामी और बंधुआ मजदूरी के विभिन्न रूपों के साथ-साथ भव्य भ्रष्टाचार में भी जारी रहेंगी। (1)

उन प्रथाओं में से एक जो फलती-फूलती रहेगी, वह है पीस रेट मजदूरी और कोटा की प्रणाली, जिसे श्रमिकों को अधिक उत्पादन करने के लिए कड़ी मेहनत करने के लिए मजबूर करने के लिए बनाया गया है। आधुनिक उद्योग में पुरस्कार और प्रोत्साहन की एक व्यवस्था के रूप में समझा जाता है – और वर्तमान गिग अर्थव्यवस्था और तकनीकी दुनिया में अवसर और स्वरोजगार विशेषाधिकार के रूप में – पीस रेट मजदूरी  प्रणाली श्रम अनुशासन में निहित है। यह श्रमिकों को मजबूर करने के लिए बनाया गया है; श्रमिकों से अधिक काम निकालवाने के लिए।

इस प्रणाली की प्रभावशीलता यह है कि ऐसा प्रतीत होता है कि श्रमिक खुद से अधिक काम करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। तो सोच यह है कि श्रमिक लक्ष्य और कोटा को पूरा करने के लिए खुद ही खूब प्रयत्न कर रहे हैं उस काम के लिए जो वह पीस रेट मजदूरी में कर रहे हैं। ऐसा करने की मजबूरी को नियोक्ताओं द्वारा मनुष्यों की अंतर्निहित प्रतिस्पर्धा को पोषित करने के रूप में उचित ठहराया जाता है, अक्सर इसे सही ठहराने के लिए डार्विन के “सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट” का दुरुपयोग किया जाता है। (2)

करोड़ों मजदूरों के लिए यह मजबूरी – यह अथक दबाव – नहीं बदला है। पीस रेट मजदूरी और कोटा द्वारा लगाए गए दबाव एक आंतरिक प्रतिस्पर्धा करने की इच्छा से नहीं उपजा है, लेकिन केवल जीवित रहने के लिए हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मजदूरों और उनके परिवारों को अच्छे स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और भोजन और पोषण और जीवन की बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक निश्चित निर्वाह मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा दोनों से वंचित किया जाता है। जैसा कि हमने कहीं और भी समझाया है, पीस रेट मजदूरी और कोटा बाल श्रम का एक प्रमुख चालक हैं।

पीस रेट मजदूरी और कोटे द्वारा बनाया गया दबाव, श्रमिकों के स्वास्थ्य पर विनाशकारी प्रभाव डालता है।

पीस रेट मजदूरी, कोटा या लक्ष्यों के दबाव में श्रमिकों को अपनी शारीरिक हद से ज़्यादा काम करते हैं। अत्यधिक काम और  बिना आराम या भोजन के  लंबे समय तक काम करना उतनी ही आम बात है बागान और कृषि श्रमिकों और मांस उद्योग के श्रमिकों के लिए जितनी यह बड़ी होटलों और दुनिया भर में फास्ट फूड चेन में श्रमिकों के लिए है। कोटा, लक्ष्य और पीस रेट मजदूरी, श्रमिकों को शारीरिक रूप जितना हो सके उससे अधिक समय तक काम करने के लिए मजबूर करते हैं। उनका दिमाग और तंत्रिका तंत्र उन्हें काम करना बंद करने और आराम करने के लिए कहते हैं। उनका शरीर बार-बार संकेत भेजता है (यानी दर्द)। कोटा उन्हें कहते हैं कि इस सब पर ध्यान न दें और काम करते रहें।(3)

आवश्यक समय जो कोटा पूरा करने या पीस रेट मजदूरी के माध्यम से पर्याप्त मजदूरी हासिल करने महत्वपूर्ण है। यह इतना महत्वपूर्ण है कि श्रमिकों को आराम ब्रेक, भोजन  ब्रेक और शौचालय ब्रेक को छोड़ना होगा और खुद को अपनी शारीरिक क्षमताओं से ज़्यादा काम करना होगा। दरअसल, समय न गंवाने और अपने लक्ष्यों तक पहुंचने के प्रयास में, श्रमिकों को व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा उपायों को छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे उनके स्वास्थ्य और उनके जीवन के लिए जोखिम बढ़ जाता है। जब  पीस रेट मजदूरी  या कोटा के दबाव में जब श्रमिक काम करते है तोह श्रमिक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पेहेन्ने के लिए रुक नहीं सकते है या सावधानी से सुरक्षा निर्देशों का पालन नहीं कर सकते हैं क्योंकि वे उस समय कमाई खो रहे हैं। उस कमाई की जितनी अधिक आवश्यकता होगी, जोखिम उतना ही अधिक होगा।

नियोक्ता  पीस रेट मजदूरी और कोटा के प्रभावों की उपेक्षा करते हैं और इसके बजाय श्रमिकों को असुरक्षित तरीके से काम करने के लिए दोषी ठहराते हैं। सामूहिक सौदेबाजी के माध्यम से निर्वाह मजदूरी की गारंटी देने और आठ घंटे में सुरक्षित रूप से काम के बोझ को फिर से तय करने के बजाय, नियोक्ता सभी प्रकार के प्रशिक्षण शुरू करते हैं … और हर तरह की सजा। यह एक परेशान करने वाली विडंबना है कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां भी श्रमिकों को  पीस रेट मजदूरी और कोटा के दबाव में स्वास्थ्य और सुरक्षा को शॉर्टकट करने के लिए मजबूर करती हैं और फिर इन शॉर्टकट के लिए सजा की जटिल प्रणाली पेश करती हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि जैसे ही जलवायु परिवर्तन की वजह से तापमान बढ़ेंगे, वहीँ हीट स्ट्रेस या गर्मी की वजह से थकावट और हाइपरथर्मिया का अधिक खतरा होगा (4)। पानी पीने, छांव की तलाश और अभी आराम करने के लिए अगर मजदूर रुक नहीं सकते हैं, तो कल्पना कीजिए कि अगले दो दशकों में यह कैसा होगा। इन परिस्थितियों में,  पीस रेट मजदूरी और कोटा का दबाव कई और श्रमिकों को मार देगा।

आखिरकार, यह डर के बारे में है। पर्याप्त कमाई न होने का डर या अपनी नौकरी खोने का डर ज्यादातर श्रमिकों को जो पीस रेट मजदूरी और कोटा पर निर्भर हैं उनको मजबूर करता है। “टीम को निराश करना” के लिए दोषी ठहराए जाने का भी डर है, जो महत्वपूर्ण मानसिक तनाव उत्पन्न करता है। वास्तव में, मैं जिन कई युवा श्रमिकों से मिला हूं, उनके लिए पर्याप्त मेहनत न करने या टीम को निराश करने के लिए दोषी ठहराए जाने का डर उनकी नौकरी खोने के डर से कहीं अधिक है। फिर भी कई नियोक्ताओं के लिए ऐसा लगता है कि यह डर उनके आधुनिक रोजगार प्रथाओं की ज़रुरत है जिसके बिना उनका काम नहीं हो सकता।

फिलाडेल्फिया घोषणा के सत्तर साल बाद, हमें सवाल करना चाहिए कि हम पर्याप्त प्रगति क्यों नहीं कर रहे हैं। श्रम बहुत अधिक एक वस्तु है और इसे बनाए रखने वाले कारकों में से एक  पीस रेट मजदूरी प्रणाली, कोटा और लक्ष्य का दबाव है। यह वह दबाव है जो भय और निर्वाह मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा के अभाव पर निर्भर करता है।

इस डर पर काबू पाने और निर्वाह मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा की अनुपस्थिति वास्तव में 10 मई 1944 को फिलाडेल्फिया घोषणा में घोषित दूसरे सिद्धांत पर निर्भर हो सकती है:

(बी) निरंतर प्रगति के लिए अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता आवश्यक है;

प्रगति करना शुरू करने का समय आ गया है।

डॉ मुहम्मद हिदायत ग्रीनफील्ड, आय.यु.फ एशिया/पसिफ़िक क्षेत्रीय सचिव

फिलीपींस में होटल हाउसकीपिंग श्रमिकों ने विरोध किया “कमरों का कोटा जानलेवा है!” अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक स्मृति दिवस पर, 28 अप्रैल 2018

नोट्स:

  1. भव्य भ्रष्टाचार सरकार के उच्चतम स्तर पर भ्रष्टाचार और/या सार्वजनिक पद के धारकों के बीच भ्रष्टाचार है जो किसी लोगों या किसी विशेष सामाजिक समूह के मौलिक अधिकारों को खोखला करता है। उदाहरण के लिए देखें ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भव्य भ्रष्टाचार की कानूनी परिभाषा।
  2. “सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट” योग्यता की उत्तरजीविता की अवधारणा एक विशेष प्राकृतिक वातावरण में प्रजनन की जैविक अवधारणा को संदर्भित करती है। “योग्यता”का तात्पर्य आनुवंशिक रूपांतरों के एक विशिष्ट वर्ग के बीच प्रजनन उत्पादन की दर से है। इसलिए, डार्विन इस बात का जिक्र कर रहे थे कि कैसे कुछ जीवित जीवों को दूसरों की तुलना में तत्काल, स्थानीय वातावरण के लिए बेहतर तरीके से बने है और वे कैसे अनुकूल होते हैं। इसका प्रतिस्पर्धा या मुकाबला से कोई लेना-देना नहीं है। जैसा कि आज प्रयोग किया जाता है, योग्यतम की उत्तरजीविता दूसरों के साथ अनुचित या अमानवीय व्यवहार के लिए केवल एक बहाना है, यह उचित ठहराते हुए कि वे क्यों पीछे रह गए हैं। जाहिर है, जीवविज्ञानी 1869 से आगे बढ़े हैं और वैज्ञानिक सोच मौलिक रूप से बदल गई है। कॉर्पोरेट सोच नहीं बदली है।
  3. कई उद्योगों में नियोक्ताओं के लिए श्रमिकों के लिए विभिन्न प्रकार के “दर्द निवारक” प्रदान करना या उन्हें लेने के लिए प्रोत्साहित करना एक आम बात है। यह भी औपनिवेशिक काल से है जब कार्य व्यवस्था के हिस्से के रूप में अफीम का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। यह अक्सर एक तरह के भुगतान का गठन करता था और अफीम की लत के कारण कर्ज और बंधन होता था। कुक्कुट प्रसंस्करण और सीफ़ूड प्रसंस्करण उद्योगों में आज दर्द निवारक का उपयोग व्यापक है, उदाहरण के लिए, जहां इन-हाउस (कंपनी के) डॉक्टरों या नर्सों को केवल दर्द निवारक दवाएं लिखने या प्रदान करने की अनुमति है और उन्हें कर्मचारियों को काम करते रहने की सलाह देनी चाहिए (ऐसा बोला जाता हैं)। बेशक दर्द निवारक केवल उन संकेतों को मारते हैं जो शरीर हमें रुकने और आराम करने के लिए भेज रहा है। बेशक काम करते रहने की मजबूरी पीस-रेट और कोटा सिस्टम से ही आती है।
  4. हाइपरथर्मिया खतरनाक रूप से उच्च शरीर के तापमान को संदर्भित करता है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरा है।

 

Union office raided, striking NagaWorld workers arrested, as management and authorities respond with repression

Union office raided, striking NagaWorld workers arrested, as management and authorities respond with repression

Four hours before midnight on New Year’s Eve, police raided the office of the Labor Rights Supported Union of Khmer Employees of Naga World (LRSU), arresting nine trade union leaders and members. They remain in custody on unspecified charges.

The arrests occurred as NagaWorld management lobbied government authorities and colluded with the key officials in the Ministry of Labour to force an end to the peaceful strike action that started on December 18, 2021.

Despite the fact that the peaceful strike is a direct result of a series of management failures, NagaWorld refused to find a constructive solution and restore industrial relations. The company – a subsidiary of Hong Kong-based NagaCorp – has instead chosen to take repressive measures against workers and escalate the crisis.

Striking workers at NagaWorld band together to protect union leaders from further arrests

“The strike is caused by repeated management failure….” NagaWorld’s mismanagement and multiple failures in 2021 continues into 2022.

“The strike is caused by repeated management failure….” NagaWorld’s mismanagement and multiple failures in 2021 continues into 2022.

Acting against all common sense and decency, and with complete disregard for the negative impact on employees, guests, investors and the gaming industry, NagaWorld management in Cambodia has chosen to start 2022 with an escalation of a crisis that could easily have ended in 2021.

Deeply frustrated and dismayed by the repeated refusal of NagaWorld management to engage in good faith negotiations over the forced mass redundancy of over 1,300 workers that left many destitute and in poverty, union members overwhelmingly voted in favour of strike action in early November 2021. The union, LRSU, issued a notice of strike on November 22, 2021, entitled “Notice of peaceful strike in front of Naga World from December 18, 2021 until a solution is found”. In the four weeks that followed, NagaWorld management did nothing to try to find that solution.

While LRSU made every effort to find a negotiated solution over this four week period, management refused to talk and simply avoided attending the first of three mediation meetings with the Ministry of Labour. When management finally attended these meetings, they remained silent, relying on ministry officials to pressure the union to give up workers’ demands.

LRSU expressed the frustration and disappointment of union members in its letter to management on December 9, 2021:

In fact, union members, who are employees of your company, are so deeply angered and frustrated by the mass forced redundancies and failure to recognize their contribution and hard work is evidence of corporate failure. Obviously, workers do not easily decide to strike, they spent a lot of time fulfilling the legal requirements and finally voted overwhelmingly to decide to strike, which is the result of frustration and a loss of confidence in the company’s management.

This included the failure to find a solution through negotiations:

Instead of engaging in good faith negotiations and working together to find a solution, the company has exploited loopholes and shortcomings in the law and legal process to escape its responsibility. The real context of the strike notice is the repeated failure of management to act in good faith to find a solution to this situation.

As LRSU states very clearly in its December 9 letter to NagaWorld management, this is a strike caused by management failure:

The strike is caused by repeated management failure and a complete loss of trust in the ability of management to resolve these issues.

On the first day of the strike action on December 18, management still made no effort to engage in negotiations to prevent the escalation of the labour dispute and limit damage to the business. Instead management sought a legal injunction against the strike and lobbied the authorities to label the strike as “illegal”. In desperation, senior Ministry of Labour officials turned to social media to discredit the strike, dangerously labelling it as a politically motivated “colour revolution”. This blatant attempt to justify repressive political measures to end an industrial dispute prompted widespread public criticism.

As one of the largest integrated gaming resorts in Asia, the crisis at NagaCorp’s NagaWorld in Cambodia has repercussions for the region. Repeated failures by management – including lax COVID-19 safety protocols and attempts to cover up a community outbreak in one of its casinos  in February and March 2021 – have propelled the company into a prolonged crisis in 2022.

The placards in Khmer, English and Chinese read: Naga World Casino Cambodia Employees on Strike! We were terminated after protesting against management’s failure to maintain COVID-19 safety for workers & guests

 

“শ্রম পণ্য নয়।” কিন্তু পিস-রেট মজুরির চাপ, কোটা এবং ভয় শ্রমকে পণ্য হিসাবে নিশ্চিত করে।

“শ্রম পণ্য নয়।” কিন্তু পিস-রেট মজুরির চাপ, কোটা এবং ভয় শ্রমকে পণ্য হিসাবে নিশ্চিত করে।

১০ মে ১৯৪৪ তারিখে গৃহীত ফিলাডেলফিয়া ঘোষণা, ১৯১৯ সালে প্রতিষ্ঠিত আন্তর্জাতিক শ্রম সংস্থা (আইএলও) এর লক্ষ্য ও উদ্দেশ্যগুলিকে পুনর্নিশ্চিত ও সংজ্ঞায়িত করে। প্রথম অনুচ্ছেদটি ঘোষণা করে:

(ক) শ্রম পণ্য নয়;

ঘোষণাটি একটি গুরুত্বপূর্ণ ঐতিহাসিক সন্ধিক্ষণে এসেছিল, স্বাধীনতার জন্য সংগ্রামরত অনেক দেশের জন্য উপনিবেশবাদের অবসানের সূচনাকে উদ্যাপন করে। অনেক সদ্য স্বাধীন দেশে ভাষা, শিক্ষা, আইন, সীমানা, জমির মালিকানা, একইসাথে শাসন ব্যবস্থার কাঠামোতে ঔপনিবেশিকতার অবশিষ্টাংশ অব্যাহত ছিল। বর্ণবাদ, বৈষম্য, দাসত্ব, এবং বন্ডেড লেবার বা শ্রম দাসত্বের পাশাপাশি ব্যাপক দুর্নীতির মতো বিভিন্ন ধরণের  ঔপনিবেশিক অনুশীলনগুলি অব্যাহত ছিল। (১)

অন্যতম আরো একটি চর্চা যার বৃদ্ধি অব্যাহত ছিল তা হল পিস-রেট মজুরি এবং কোটার ব্যবস্থা, যা শ্রমিকদের আরও বেশি উৎপাদন করার জন্য কঠোর পরিশ্রম করতে বাধ্য করার জন্য ডিজাইন বা তৈরী করা হয়েছিল। আধুনিক শিল্পে পুরষ্কার এবং প্রণোদনার ব্যবস্থা হিসাবে বোঝা যায় – এবং বর্তমান গিগ অর্থনীতি (মুক্তবাজার অর্থনীতি) এবং প্রযুক্তি জগতে সুযোগ এবং স্ব-নিযুক্ত বিশেষাধিকার হিসাবে – পিস-রেট মজুরি ব্যবস্থা শ্রম শৃঙ্খলার মধ্যে নিহিত। এটা ডিজাইন করা হয়েছে শ্রমিকদের বাধ্য করার জন্য; শ্রমিকদের কাছ থেকে আরো শ্রম আহরণ করতে।

এই ব্যবস্থার কার্যকারিতা হল এটা মনে হয় যেন শ্রমিকরা নিজেদের থেকে আরও বেশি করে আহরণের জন্য কঠোর পরিশ্রম করছে। তাই চিন্তাভাবনা চলছে, শ্রমিকরা লক্ষ্য এবং কোটা পূরণের জন্য নিজেদেরকে ঠেলে দিচ্ছে, পিস-রেট মজুরি যা উৎপাদন করার জন্য ডিজাইন করা হয়েছে তার আরও বেশি করে পিস তৈরি করে। এটি করার বাধ্যবাধকতা নিয়োগকর্তাদের দ্বারা ন্যায্যতা হিসাবে মানুষের অন্তর্নিহিত প্রতিযোগিতামূলকতাকে লালন করা হয়, প্রায়শই এটিকে ন্যায্যতা দেওয়ার জন্য ডারউইনের “যোগ্যতমের বেঁচে থাকার” অপব্যবহার করে। (২)

লক্ষ লক্ষ শ্রমিকের জন্য এই বাধ্যবাধকতা – এই নিরলস চাপ – পরিবর্তন হয়নি। পিস-রেট মজুরি এবং কোটা দ্বারা প্রয়োগ করা চাপ প্রতিযোগিতা করার অভ্যন্তরীণ আকাঙ্খা থেকে নয়, শুধুমাত্র বেঁচে থাকার জন্য। এটি ঘটে কারণ শ্রমিক এবং তাদের পরিবারগুলি একটি নিশ্চিত জীবন ধারনের জন্য পর্যাপ্ত মজুরি এবং ভালো স্বাস্থ্য, শিক্ষা, আবাসন এবং খাদ্য ও পুষ্টি এবং একটি উন্নত মানের জীবনযাত্রা নিশ্চিত করার জন্য প্রয়োজনীয় সামাজিক সুরক্ষা উভয়ই থেকে বঞ্চিত। যেমনটি আমরা অন্যত্র ব্যাখ্যা করেছি, পিস-রেট মজুরি এবং কোটা শিশু শ্রমের মূল চালিকাশক্তি। পিস-রেট মজুরি এবং কোটা দ্বারা সৃষ্ট চাপ শ্রমিকদের স্বাস্থ্যের উপর অত্যন্ত ক্ষতিকর প্রভাব ফেলে।

পিস-রেট, কোটা বা টার্গেট এর চাপে শ্রমিকরা তাদের শারীরিক সীমাবদ্ধতার উর্দ্ধে কাজ করে। অত্যাধিক কাজের চাপ এবং বিশ্রাম বা খাবার ছাড়া দীর্ঘ কর্মঘণ্টা বাগানে এবং খামারের শ্রমিক এবং মাংস শিল্পের শ্রমিকদের জন্য যেমন সাধারণ ঘটনা, তেমনি এটি বিশ্বজুড়ে বিলাসবহুল হোটেল এবং ফাস্ট ফুড চেইনের শ্রমিকদের জন্যও। কোটা, লক্ষ্যমাত্রা (টার্গেট) এবং পিস-রেট শ্রমিকদের শারীরিকভাবে যত সময় কাজ করতে সক্ষম তার চেয়ে বেশি সময় কাজ করতে চালিত করে। তাদের মস্তিষ্ক এবং স্নায়ুতন্ত্র তাদের কাজ বন্ধ করে বিশ্রাম নিতে বলে। তাদের শরীর বারবার সংকেত পাঠায় (অর্থাৎ ব্যথা)। কোটা তাদের বলে এই সব কিছু উপেক্ষা করে কাজ চালিয়ে যেতে। (৩)

কোটা পূরণ বা পিস-রেটের মাধ্যমে পর্যাপ্ত মজুরি অর্জনের জন্য প্রয়োজনীয় সময়টি গুরুত্বপূর্ণ হয়ে ওঠে। এটি এতই গুরুত্বপূর্ণ যে শ্রমিকদের অবশ্যই বিশ্রামের বিরতি, খাবার বিরতি এবং টয়লেট বিরতি ত্যাগ করতে হয় এবং নিজেদেরকে তাদের শারীরিক সীমার বাইরে কাজের মধ্যে ঠেলে দিতে হয়। এমনকি, সময় না হারানোর এবং তাদের লক্ষ্যে পৌঁছানোর প্রয়াসে, শ্রমিকরা  তাদের স্বাস্থ্য এবং জীবনের ঝুঁকি বাড়িয়ে পেশাগত স্বাস্থ্য এবং নিরাপত্তা ব্যবস্থা পরিত্যাগ করতে বাধ্য হয়। পিস-রেট বা কোটার চাপের মধ্যে, শ্রমিকরা ব্যক্তিগত সুরক্ষামূলক সরঞ্জাম পরিধান করা বন্ধ করতে পারে না বা সাবধানে সুরক্ষা নির্দেশাবলী অনুসরণ করতে পারে না কারণ তারা সেই সময়ে আয় হারাচ্ছে। সেই আয়ের প্রয়োজন যত বেশি, ঝুঁকিও তত বেশি।

নিয়োগকর্তারা পিস-রেট এবং কোটার প্রভাব উপেক্ষা করেন এবং এর পরিবর্তে অনিরাপদভাবে কাজ করার জন্য শ্রমিকদের দোষারোপ করেন। যৌথ দরকষাকষির মাধ্যমে জীবনযাপনের জন্য শোভন মজুরির নিশ্চয়তা দেওয়ার পরিবর্তে এবং আট ঘন্টার মধ্যে নিরাপদে কাজ করার জন্য কাজের চাপ পুনরায় ডিজাইন করার পরিবর্তে, নিয়োগকর্তারা সব ধরণের প্রশিক্ষণ … এবং সকল ধরণের শাস্তি প্রবর্তন করে। এটি একটি গভীর বিরক্তিকর বিড়ম্বনার বিষয় যে এমনকি বিশ্বের বড় বড় কোম্পানিগুলোও পিস-রেট এবং কোটার চাপে শ্রমিকদের স্বাস্থ্য ও নিরাপত্তা শর্টকাট করতে বাধ্য করে তারপর এই শর্টকাটগুলির জন্য শাস্তির জটিল ব্যবস্থা চালু করে।

এতে কোন সন্দেহ নেই যেহেতু জলবায়ু পরিবর্তনের ফলে তাপমাত্রা বৃদ্ধি হচ্ছে, অতিরিক্ত তাপের ফলে শারীরবৃত্তীয় চাপ (হিট স্ট্রেস) বা তাপ সম্পর্কিত শারীরিক অবসাদ (হিট ইগজোশন) হওয়া এবং হাইপারথার্মিয়া হওয়ার অধিকতর ঝুঁকি থাকবে (৪)। শ্রমিকরা যদি বিশ্রামের বিরতির জন্য পানি পান করার জন্য, ছায়া খুঁজতে এবং বিশ্রামের জন্য এখনই সময় বের করতে না পারে, তাহলে আগামী দুই দশকে কেমন হবে তা কল্পনা করুন। এই পরিস্থিতিতে, পিস-রেট এবং কোটার চাপ আরও অনেক শ্রমিককে হত্যা করবে।

শেষ পর্যন্ত এটি ভয় সম্পর্কিত। পর্যাপ্ত উপার্জন না করার ভয় বা তাদের চাকরি হারানোর ভয়ই বেশিরভাগ শ্রমিককে বাধ্য করে যারা পিস-রেট মজুরি এবং কোটার উপর নির্ভরশীল। দোষী হওয়ার, “দলকে হতাশ করার” ভয়ও রয়েছে, যা উল্লেখযোগ্য মানসিক চাপ তৈরি করে। প্রকৃতপক্ষে, আমার দেখা অনেক যুব শ্রমিকদের জন্য, পর্যাপ্ত পরিশ্রম না করার জন্য বা দলকে হতাশ করার জন্য দোষী হওয়ার ভয় তাদের চাকরি হারানোর ভয়কে ছাড়িয়ে যায়। তবুও অনেক নিয়োগকর্তার কাছে মনে হয় যে এই ভয় তাদের আধুনিক কর্মসংস্থান অনুশীলনের মূলভিত্তি।

ফিলাডেলফিয়া ঘোষণার ৭৭ বছর পরও কেন আমরা যথেষ্ট অগ্রগতি করতে পারি নাই তা নিয়ে প্রশ্ন তোলা উচিত। শ্রম অনেকটাই পণ্য এবং এটিকে টিকিয়ে রাখার অন্যতম কারণ হল পিস-রেট মজুরি ব্যবস্থা, কোটা এবং লক্ষ্যমাত্রার (টার্গেট) চাপ। এটি এমন চাপ যা ভয় এবং জীবিকার জন্য শোভন মজুরি এবং সামাজিক সুরক্ষার না থাকার উপর নির্ভর করে।

এই ভয় কাটিয়ে ওঠা এবং জীবিকার জন্য শোভন মজুরি এবং সামাজিক সুরক্ষার অনুপস্থিতি আসলে ১০ মে ১৯৪৪-এ ফিলাডেলফিয়ার ঘোষণায় ঘোষিত দ্বিতীয় নীতির উপর নির্ভর করে:

(খ) টেকসই অগ্রগতির জন্য মত প্রকাশের স্বাধীনতা এবং সংগঠনের স্বাধীনতা অপরিহার্য;

এখনই অগ্রগতি শুরু করার সময়।

ডক্টর মুহাম্মদ হিদায়াত গ্রীনফিল্ড, আইইউএফ এশিয়া/প্যাসিফিক রিজিওনাল সেক্রেটারি

আন্তর্জাতিক শ্রমিক স্মৃতি দিবসে ফিলিপাইনে হোটেল হাউসকিপিং শ্রমিকদের বিক্ষোভ “রুম কোটা হত্যা করে !”, ২৮ এপ্রিল ২০১৮

টিকা

১। ব্যাপক দুর্নীতি (গ্রান্ড করাপশন) হল সরকারের সর্বোচ্চ স্তরের দুর্নীতি এবং/অথবা সরকারি অফিসে দায়িত্বে থাকা ব্যক্তিদের মধ্যে দুর্নীতি যা  জনগণ বা একটি নির্দিষ্ট সামাজিক গোষ্ঠীর মৌলিক অধিকারকে ক্ষুন্ন করে। উদাহরণস্বরূপ ট্রান্সপারেন্সি ইন্টারন্যাশনালের ব্যাপক দুর্নীতির (গ্রান্ড করাপশন) আইনি সংজ্ঞা দেখুন।

২। যোগ্যতমের বেঁচে থাকার ধারণাটি একটি নির্দিষ্ট প্রাকৃতিক পরিবেশে প্রজননের একটি জৈবিক ধারণাকে বোঝায়। “ফিটনেস” জেনেটিক বৈচিত্রের একটি নির্দিষ্ট শ্রেণীর মধ্যে প্রজনন আউটপুটের হারকে বোঝায়। তাই ডারউইন উল্লেখ করছিলেন কীভাবে কিছু জীবন্ত প্রাণী অন্যদের তুলনায় তাৎক্ষণিক, স্থানীয় পরিবেশের জন্য আরও ভালভাবে ডিজাইন করা হয় এবং কীভাবে তারা মানিয়ে নেয়। এর সাথে প্রতিযোগিতার কোনো সম্পর্ক নেই। যেমনটি আজ ব্যবহার করা হয়, যোগ্যতমের বেঁচে থাকা অন্যদের প্রতি অন্যায্য বা অমানবিক আচরণের জন্য একটি অজুহাত, কেন তারা পিছিয়ে আছে তা ন্যায্যতা দেয়। স্পষ্টতই জীববিজ্ঞানীরা ১৮৬৯ সাল থেকে এগিয়ে গেছেন এবং বৈজ্ঞানিক চিন্তাধারা মৌলিকভাবে পরিবর্তিত হয়েছে। কর্পোরেট চিন্তা পরিবর্তিত হয় নাই।

৩। শ্রমিকদের জন্য বিভিন্ন ধরনের “ ব্যথানাশক” প্রদান বা উৎসাহিত করা বিভিন্ন শিল্পে নিয়োগকর্তাদের জন্য একটি সাধারণ অভ্যাস। এটি ঔপনিবেশিক সময়েও ছিল যখন কাজের শাসনের অংশ হিসাবে মাদক ব্যাপকভাবে ব্যবহৃত হত। এটি প্রায়শই ধরনের অর্থপ্রদান করে এবং মাদকের প্রতি আসক্তি ঋণ এবং শ্রম দাসত্বের দিকে পরিচালিত করে। পোল্ট্রি প্রক্রিয়াকরণ এবং সামুদ্রিক খাবার প্রক্রিয়াজাতকরণ শিল্পে বর্তমানে আজ ব্যথানাশকদের ব্যবহার ব্যাপক, উদাহরণস্বরূপ, যেখানে কারখানার ডাক্তার বা নার্সদের শুধুমাত্র ব্যথানাশক ওষুধ দেওয়ার বা প্রদান করার অনুমতি দেওয়া হয় এবং শ্রমিকদের অবশ্যই কাজ চালিয়ে যাওয়ার পরামর্শ দিতে হয়। ব্যথানাশক অবশ্যই কেবল সেই সংকেতগুলিকে বাধাগ্রস্থ করে যা শরীর আমাদেরকে কাজ থামাতে এবং বিশ্রামের জন্য পাঠাচ্ছে। অবশ্যই কাজ চালিয়ে যাওয়ার বাধ্যবাধকতা পিস-রেট এবং কোটা পদ্ধতি থেকেই আসে।

৪। হাইপারথার্মিয়া বলতে বিপজ্জনকভাবে শরীরের উচ্চ তাপমাত্রাকে বোঝায় যা আমাদের স্বাস্থ্যের জন্য হুমকি স্বরূপ।

Eliminating Violence Against Women: Taking action through education, awareness & organizing

Eliminating Violence Against Women: Taking action through education, awareness & organizing

Throughout the month of November, affiliated unions across the Asia-Pacific region launched a renewed effort to raise awareness and mobilize members to reduce the vulnerability of women workers, overcome fear, and eliminate all forms of violence against women. These coordinated activities across the region were the result of the decision of the IUF Asia/Pacific Regional Women’s Committee to mobilize for the International Day for the Elimination of Violence Against Women on November 25, 2021, and promote the Violence and Harassment Convention, 2019 (No. 190) and Violence and Harassment Recommendation, 2019 (No. 206).

The IUF Asia/Pacific posters and the statement for the International Day for the Elimination of Violence Against Women were distributed in 21 languages in the Asia-Pacific region, including English, Japanese, Bengali, Hindi, Urdu, Sindhi, Pashto, Nepali, Sinhalese, Indonesian, Khmer, Thai, Tagalog, Chinese (traditional), Chinese (simplified), Burmese, Karen, Kachin, Mon, Arkanese and Shan.

In Pakistan the women agricultural and farm workers’ union, Sindh Nari Porhyat Council (SNPC), held an education programme for members on November 27, explaining the role of the union in ensuring that women can work free from violence. This includes measures to protect women when traveling to and from work and when physically isolated in farms and fields.

In the food and beverage sector, the women’s officers of the Pakistan Food Workers’ Federation (PFWF), explained the posters to union members in the workplace – targeting men workers – and distributed education material. This was vital in improving members’ awareness and understanding of the causes of violence against women and that stopping this violence is the responsibility of all union members, not only women. Discussions focused on ways to ensure a safe and secure workplace for women.

IUF-affiliated unions in Pakistan together with affiliates of Public Services International (PSI) jointly organized a seminar in Hyderabad on the ratification and adoption of ILO Convention No.190 and Recommendation No.206 on November 27, 2021. A second seminar on ILO Convention No.190 and Recommendation No.206 was held on November 29 in Karachi and was attended by trade unionists, journalists and parliamentarians. The meeting resolved to reform a committee to develop a national strategy for the ratification of ILO Convention No.190.

In Bangladesh, IUF-affiliated unions also organized a seminar on the ratification and adoption of ILO Convention No.190 and Recommendation No.206 on November 20, 2021. This was followed by education and awareness activities at factories and workplaces.

The seminar recommendations included the urgent need for legislation and policies in line with ILO Convention No.190, and that provisions for forming a joint sexual harassment prevention committee consisting of equal representation of workers and employers in each factory to be included in the Bangladesh labour law. The meeting called for amending labour laws to give the right to form trade unions for workers engaged in the informal sector, including domestic workers and non-farm agricultural waged workers. It is necessary to fix minimum wages for women workers in this sector and extend social protection to reduce their vulnerability.

In India, the General Secretary of the Gujarat Agriculture Labour Union (GALU) organized series of education sessions on eliminating violence against women with local organizers so they can use the posters in their own meetings in villages. GALU also made eliminating violence against women a part of their program in the “School of Democracy” run to educated rural youth on union activities and public governance.

In Assam, India, the Women’s’ Water, Sanitation and Health Committees held a series of education and awareness activities in several tea plantations. The posters were used to introduce the key concepts and to discuss women’s experiences of violence and harassment in the plantation. Women tea workers reported on both the physical and economic vulnerabilities, the daily verbal and physical abuse they face, and discussed how this can be overcome through concerted action by their self-organized Women’s’ Water, Sanitation and Health Committees.

In Indonesia, the Federation of Hotel, Restaurant, Plaza, Apartment, Catering and Tourism Workers’ Free Union (FSPM) and the National Federation of Food and Beverage Workers (FSBMM) launched awareness campaigns in the workplace.

FSPM undertook an intensive awareness campaign among members in hotels and restaurants in Bandung, Surabaya and Yogyakarta. The unions also posted the posters on union noticeboards in the workplace.

The FSBMM Women’s Committee and FSBMM Youth Committee included the issue of violence against women in the agenda of their respective meetings in Bogor on November 13 and 14, 2021. FSBMM combined education and training with stronger policy commitments by affiliated unions, collective bargaining and negotiating more effective measures to make workplaces safe for women.

In Myanmar, a city-wide federation of hotel and resort workers held education and awareness activities on December 3, 2021. The posters were used to facilitate discussion of the different kinds of fear women face, what causes it, and what should be done. Women hotel and resort workers explained the way in which irregular, precarious employment arrangements and job insecurity contribute to their vulnerability and the violence they face.