by IUF Asia/Pacific | Jul 27, 2023 | မြန်မာဘာသာ Myanmar language, ភាសាខ្មែរ Khmer, हिन्दी Hindi, বাংলা Bengali, ภาษาไทย Thai, Bahasa Indonesia, Urdu اُردُو, 日本語 Japanese
سٹاربکس امریکا میں سٹاربکس میں منظم نوجوان کارکنوں پر ایک منظم حملے میں مصروف ہے۔ ورکرز کو محض یونینز بنانے اور ان میں شامل ہونے کے اپنے عالمی انسانی حق کو استعمال کرنے کے لیے تشدد، ایذا رسانی اور غیر منصفانہ برطرفی کا سامنا کرنا پڑتا ہے۔ اس کے جواب میں، کارکنان پورے ایشیا پیسیفک کے خطے میں یہ مطالبہ کرنے کے لیے متحرک ہو رہے ہیں کہ سٹاربکس کارکنوں کے حقوق کا احترام کرے!
اس سلسلے میں انگریزی، جاپانی، خمیر، میانمار (برمی)، تھائی، انڈونیشیائی، ہندی، نیپالی، چینی (روایتی)، بنگالی، کورین اور اردو میں نیچے دیے گئے پلے کارڈز اور پوسٹرز دیکھیں۔
انگریزی

جاپانی

خمیر

میانمار (برمی)

تھائی

انڈونیشیائی

ہندی

نیپالی

چینی (روایتی)

بنگالی

کورین

اردو

by IUF Asia/Pacific | Jul 22, 2023 | မြန်မာဘာသာ Myanmar language, ភាសាខ្មែរ Khmer, हिन्दी Hindi, বাংলা Bengali, ภาษาไทย Thai, Bahasa Indonesia, Campaigns, Freedom of Association, 日本語 Japanese, اردو Urdu
Starbucks is engaged in a systematic, vicious attack on young workers organizing in Starbucks in the USA. Workers face victimization, harassment and unfair dismissal simply for exercising their universal human right to form and join unions. In response, workers are mobilizing across the Asia-Pacific region to demand that Starbucks respect workers’ rights!
See the placards and posters below in English, Japanese, Khmer, Myanmar (Burmese), Thai, Indonesian, Hindi, Nepali, Chinese (traditional), Bengali, Korean and Urdu.
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by IUF Asia/Pacific | Jul 22, 2023 | ភាសាខ្មែរ Khmer, हिन्दी Hindi, বাংলা Bengali, ภาษาไทย Thai, Bahasa Indonesia, Campaigns, Freedom of Association, 日本語 Japanese, اردو Urdu
Starbucks is engaged in a systematic, vicious attack on young workers organizing in Starbucks in the USA. Workers face victimization, harassment and unfair dismissal simply for exercising their universal human right to form and join unions.
In May 2018, Nestlé paid Starbucks US$7.15 billion for the right to manufacture and sell Starbucks branded coffee products. This includes “Starbucks Coffee At Home” and ready-to-drink canned and bottled coffee.
Unionized workers at Nestlé cannot accept that their employer is doing business with a viciously anti-union company like Starbucks. Workers are saying that Starbucks coffee products manufactured in Nestlé factories represent an entire corporate culture that is anti-union and “this is not out recipe!” They are calling on Starbucks to respect worker and trade union rights!
See the placards and posters below in English, Japanese, Hindi, Indonesian, Khmer, Thai, Chinese (traditional), Bengali, Korean and Urdu.
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by IUF Asia/Pacific | May 24, 2023 | हिन्दी Hindi, Climate Crisis, Climate Justice, Defending Democracy
कई देशों में सेना ने आपात स्थिति घोषित करने, लोकतंत्र को अस्थायी रूप से निलंबित करने और सत्ता हासिल करने के लिए ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकटों का इस्तेमाल किया है। अब पर्यावरण संकट का इस्तेमाल सैन्य हस्तक्षेप और सशस्त्र बलों की तैनाती को सही ठहराने के लिए भी किया जा सकता है। चूंकि जलवायु परिवर्तन चरम मौसम की घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति में वृद्धि करता है, इसलिए हम अधिक बार-बार होने वाली आपात स्थितियों की संभावना का सामना करते हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि सेना की आपातकालीन शक्तियां और लोकतंत्र का अस्थायी निलंबन भी बार-बार होगा। कई देशों में एक बहुत ही वास्तविक जोखिम यह है कि ये निरंतर जलवायु आपात स्थिति लोकतंत्र और लोकतांत्रिक अधिकारों के निरंतर निलंबन का कारण बन सकती है – वही लोकतंत्र और लोकतांत्रिक अधिकार जो जलवायु संकट से निपटने और जलवायु न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।
जब साइक्लोन मौका ने 14 मई, 2023 को बांग्लादेश के तट और म्यांमार के पश्चिमी क्षेत्र में तबाही मचाई तो इस श्रेणी-पांच तूफान ने राखीन राज्य में जीवन की दुखद हानि और व्यापक तबाही मचाई। अधिकांश राजधानी शहर, सितवे, नष्ट हो गया है।
यह अच्छी तरह से समझा जाता है कि मानव-प्रेरित (मानवजनित) जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप साइक्लोन मौका जैसी चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हुई है। जो ज़्यादा समझा नहीं जाया गया है वह यह है कि इन चरम मौसम की घटनाओं के राजनीतिक संदर्भ का मृत्यु, विनाश और विस्थापन की सीमा पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
महिला शांति नेटवर्क जिसने म्यांमार में क्रूर दमन और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर साहसपूर्वक रिपोर्ट की है उन्होंने 16 मई को एक आपातकालीन ब्रीफिंग आयोजित की जिसमें साइक्लोन मौका के प्रभाव का आकलन किया गया। ब्रीफिंग ने उन तरीकों का अवलोकन किया जिसमें सैन्य जनता ने अपने राजनीतिक दमन को आगे बढ़ाने के लिए साइक्लोन का इस्तेमाल किया:
साइक्लोन मौका को लेके जनता की प्रतिक्रिया पर रिपोर्टें सामने आने लगी हैं, जिससे पता चलता है कि जनता ने रोहिंग्या आईडीपी [आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों] के निकासी प्रयासों को ख़त्म कर दिया और तब से उनके शिविरों और आसपास के क्षेत्रों में सहायता पहुंच को बंद कर दिया है। इस तरह के निष्कर्ष, कई अन्य निष्कर्ष के बीच, 1 फरवरी, 2021 को तख्तापलट के प्रयास के बाद रखाइन राज्य में रंगभेद को और गहरा करने के जनता के कृत्यों के अनुरूप हैं।
रखाइन राज्य और बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों पर साइक्लोन मौका के विनाशकारी प्रभाव जिसको “सुविधाजनक लापरवाही” के रूप में वर्णित किया गया है, वह 2017 में सेना द्वारा किए गए नरसंहार में म्यांमार से उनके जबरन विस्थापन जिसे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने मानवता के खिलाफ अपराधों के रूप में मान्यता दी है उसकी याद दिलाता है।
यहीं पर हम जलवायु भेद्यता और सैन्य शासन के अधीन रहने वाली आबादी की भेद्यता के अभिसरण को देखते हैं। यह भेद्यता प्रणालीगत राजनैतिक उत्पीड़न और विशिष्ट जातीय समूहों के खिलाफ किए गए नरसंहार के कृत्यों द्वारा बढ़ाई गई है। न केवल लोगों को जीवन की हानि, उनके घरों का विनाश, अभाव और विस्थापन का सामना करना पड़ता है, बल्कि अपने समुदायों की रक्षा के लिए खुद को तैयार करने या सामूहिक कार्रवाई करने की संभावना गंभीर रूप से बाधित होती है।
साइक्लोन जैसे चरम मौसम की घटनाओं के बाद मानवीय संकट में हम अक्सर अंतर्राष्ट्रीय सहायता संगठनों को सैन्य शासन के साथ काम करने की आवश्यकता को उचित ठहराते हुए देखते हैं। कुछ राहत एजेंसियों का वास्तव में यह मानना है कि केंद्रीकृत अधिनायकवादी शासन सहायता के लिए एक अधिक कुशल वितरण तंत्र है। यह इस तथ्य की उपेक्षा करता है कि अधिनायकवादी शासन बड़े पैमाने पर भ्रष्ट हैं, और सार्वजनिक संसाधनों – मानवीय सहायता सहित – को शक्तिशाली अभिजात वर्ग और उनके साथियों के माध्यम से डायवर्ट किया जाता है। सार्वजनिक संसाधनों की चोरी प्रमुख कारणों में से एक है जिसकी वजह से इस तरह के शासन पहले स्थान पर मौजूद हैं।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिनायकवादी शासन के तहत, मानवीय संकट और मानवीय सहायता राजनीतिक रूप से निर्धारित होती है। राज्य और/या विशिष्ट जातीय या धार्मिक समूहों के प्रति शत्रुतापूर्ण पहचान की गई आबादी को मानवीय सहायता तक पहुंच से वंचित कर दिया जाता है। जैसा कि हम आज म्यांमार में देख रहे हैं को वहां के लोगो पर सैन्य जनता का युद्ध मानवीय सहायता न देने तक फैला हुआ है। इसका कारन समझना मुश्किल नहीं है। मानवीय संकट का शिकार होने और मानवीय सहायता के योग्य होने के लिए, आपको सबसे पहले इंसान माना जाना चाहिए।
1945 के बाद से हमने कई देशों में लोकतंत्र के अंत की शुरुआत देखी है (अक्सर विदेशी हस्तक्षेप द्वारा समर्थित) जहां राष्ट्रीय या उप-राष्ट्रीय स्तर (राज्य, क्षेत्र, प्रांत) पर आपातकाल की स्थिति घोषित की जाती है और सेना को सड़कों पर तैनात किया जाता है। एक बार सेना को सड़कों आने के बाद, सैन्य जनरल और उनके बच्चे राजनीतिक, नागरिक और आर्थिक जीवन में तेजी से आगे बढ़ते हैं।
यहां तक कि अगर एक निर्वाचित संसद या कांग्रेस की शक्तियां बहाल हो जाती हैं, और लोकतांत्रिक चुनाव फिर से शुरू हो जाते हैं, तो सेना राजनीतिक दलों पर नियंत्रण रखती है और राजनीतिक, नागरिक और आर्थिक जीवन में अपनी पैठ बनाए रखती है। लोगों के लिए यह आपातकाल की एक स्थायी स्थिति बन जाती है – एक स्थायी संकट।
इस निरंतर संकट में “जलवायु लचीलापन” को भी पुनर्परिभाषित किया गया है। जलवायु लचीलापन में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए समान सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने और मानव स्वास्थ्य, आजीविका और पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक सामूहिक जिम्मेदारी शामिल है। अब हमारे समुदायों में अधिक जलवायु लचीलेपन के लिए राजनीतिक अभिजात वर्ग के आह्वान का मतलब है कि हमें सिर्फ अगले चरम मौसम की घटना का सामना करना होगा। सामूहिक कार्रवाई और जवाबदेही के लिए लोकतांत्रिक तंत्र को छीन लिया गया है, और अधिकारों के अभाव में, जलवायु लचीलेपन का मतलब है कि कमजोर समुदायों को सिर्फ सहने की आदत दाल लेनी चाहिए है। या वहां से हट जाना चाहिए।
कई देशों में, अति दक्षिणपंथी पहले से ही जलवायु परिवर्तन से इनकार करने की बजाये जलवायु परिवर्तन दहशत को फैलाने लगे है। वे प्रभावित समुदायों (विशेष रूप से जलवायु संवेदनशील ग्रामीण समुदायों) का समर्थन करने में राज्य की विफलता को उजागर करने का एक राजनीतिक अवसर देखते हैं। इस नए संकट के सामने सुदूर दक्षिणपंथी मजबूत नेतृत्व – सत्तावादी शासन के लिए एक लोकलुभावन शब्द, के लिए अपने आह्वान को दोहरा सकते हैं। राष्ट्र के लिए एक बाहरी खतरे के जवाब में हर आपात स्थिति की तरह, लोकतंत्र के निलंबन को सही ठहराने के लिए जलवायु संकट का उपयोग अति दक्षिणपंथी द्वारा किया जाएगा।
इस व्यापक जलवायु संकट में हम अत्यधिक मौसम की घटनाओं, गर्मी की लहरों और जंगल की आग के कारण निरंतर जलवायु आपात स्थिति की संभावना का सामना कर रहे हैं। यह “जलवायु संकट” द्वारा एक चरम मौसम की घटना से दूसरे तक तेज हो जाता है (बाढ़ के बाद सूखा; मूसलाधार बारिश के बाद जंगल की आग)। क्या होगा यदि यह लगातार आपातकाल की स्थिति की ओर ले जाता है जिसमें लोकतंत्र का निलंबन स्थायी हो जाती है?
डॉ मुहम्मद हिदायत ग्रीनफील्ड, IUF एशिया/पसिफ़िक क्षेत्रीय सचिव
by IUF Asia/Pacific | Apr 29, 2023 | हिन्दी Hindi, Campaigns, Right to a Safe Workplace
28 अप्रैल अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक स्मृति दिवस है। यह शोक का दिन है, भयानक क्षति का, अनुत्तरित प्रश्नों का, क्रोध और हताशा का। 28 अप्रैल स्वास्थ्य और सुरक्षा दिवस नहीं है जैसा कि कुछ सरकारें, नियोक्ता और यूनियन चाहते हैं कि हम विश्वास करें। यह काम पर स्वास्थ्य और सुरक्षा और सरकारों और उद्योगों और कंपनियों की व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा नीतियों का जश्न मनाने का दिन नहीं है। यह उन लाखों श्रमिकों को याद करने का दिन है, जिन्होंने काम के दौरान अपनी जान गंवाई, या गंभीर चोट या बीमारी का सामना किया।
लाखों में बहनें और भाई, बेटियाँ और बेटे, पत्नियाँ, पति, माता-पिता, चचेरे भाई, दोस्त हैं, जो काम से घर नहीं आए, या जो काम के कारण हुई चोटों और बीमारी से मर गए। आँकड़े नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन। जीविकोपार्जन के लिए काम करने से जीवन कम हो जाता है। 28 अप्रैल यह पूछने का दिन है कि ऐसा अभी भी क्यों हो रहा है और यह मांग की जाती है कि इसे रोका जाए।
28 अप्रैल एक अनुस्मारक है कि हर एक कार्यकर्ता को चोट या बीमारी से मुक्त, अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में अपने प्रियजनों के पास सुरक्षित घर लौटने का अधिकार है। हम इस बहाने को स्वीकार नहीं कर सकते हैं कि वह इसलिए मरी क्योंकि यह एक खतरनाक पेशा है। यदि कोई व्यवसाय खतरनाक है, तो हमें उसे सुरक्षित बनाना चाहिए। पैसा खर्च करें, सिस्टम बनाएं, कार्य पद्धतियों में बदलाव करें, योजना बनाएं, नया स्वरूप दें और इसे सुरक्षित बनाने में निवेश करें।
आज सैन्य अनुसंधान और विकास पर अधिक खर्च हो रहा है – काम पर जीवन बचाने की तुलना में – एक दूसरे को मारने के नए तरीकों पर। सैन्य बजट और हत्या के व्यवसाय पर खर्च किए गए धन का केवल एक अंश हमें मौलिक रूप से काम को उन तरीकों से बदलने की अनुमति देगा जो खतरों को खत्म करते हैं और जोखिम को दूर करते हैं। इसका मतलब है कि काम से सुरक्षित और अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ घर आने वाले अधिक कर्मचारी। इसका मतलब यह होगा कि कम परिवार पूछेंगे कि उनके प्रियजनों को उनके काम से क्यों मारा गया। इसका मतलब होगा कि 28 अप्रैल को शोक मनाने के लिए कम जिंदगियां होंगी।
2023 में हम सैन्य संघर्ष और युद्ध को समाप्त करने, विसैन्यीकरण और शांति के लिए आह्वान करते हैं, और हम सरकारों और उनके कॉर्पोरेट प्रायोजकों से हत्या को रोकने का आह्वान करते हैं। साथ ही हम सरकारों और नियोक्ताओं से काम पर श्रमिकों की हत्या बंद करने का आह्वान करते हैं। हमें तत्काल सार्वजनिक और निजी आर्थिक संसाधनों को हत्या के धंधे से दूर स्थानांतरित करने और जीवितों की रक्षा में निवेश करने की आवश्यकता है। चोट और बीमारी के कारण कार्यस्थल पर और अधिक लोगों की जान नहीं जानी चाहिए।
मृतकों को याद करो और जीवितों के लिए संघर्ष करो। मजदूरों का वध बंद करो।

by IUF Asia/Pacific | Feb 13, 2023 | हिन्दी Hindi, Social Justice, Women Unions & Power
आज संगठनों/सरकारें/कंपनियां के भाषणों, बैठकों, सम्मेलनों और नीति दस्तावेजों में यह तेजी से सामान्य हो गया है की उन्होंने लिंग-आधारित दृष्टिकोण या लैंगिक परिप्रेक्ष्य को शामिल किया है और उसकी पुष्टि की है।
और निश्चित रूप से हम लैंगिक परिप्रेक्ष्य को शामिल करते हैं और महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानते हैं।
यह “बेशक” है जो हमें परेशान करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यह इतना स्पष्ट है कि हमें इसमें संदेह नहीं करना चाहिए। यह स्पष्ट है की यह उच्चारित है, लेकिन यह किसी तरह से बचाव के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। यह लिंग के दृष्टिकोण और महिलाओं की भूमिका को ध्यान में रखने में विफल रहने के लिए आलोचना के खिलाफ लगभग एक बीमा पॉलिसी की तरह है। लेकिन हम अक्सर सोचते रह जाते हैं कि वास्तव में लैंगिक दृष्टिकोण को कैसे शामिल किया गया था, महिलाओं ने इसमें कैसे भाग लिया (जो भी हो), और क्या महिलाओं ने वास्तव में इसके परिणाम को आकार दिया? हम पूछते रह जाते हैं, “ठीक है, लेकिन क्या यह लिंग परिप्रेक्ष्य से वास्तव में कुछ भी बदलाव आया?”
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों, विश्व बैंक और इसके अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) और IMF सहित कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से हाल की रिपोर्टों और नीति दस्तावेजों को पढ़े तोह लैंगिक परिप्रेक्ष्य, लिंग-आधारित दृष्टिकोण और लिंग-संवेदनशीलता नीतियां के निरंतर संदर्भ हैं। अब लिंग आधारित लचीलापन भी है।
पूरे अध्याय लैंगिक दृष्टिकोण को समर्पित हैं। ज्यादातर मामलों में महिलाएं सिर्फ अब आँकड़ों में शामिल हैं। तथ्यों और आंकड़ों में लिंग के आंकड़े है जो एक दशक पहले नहीं थे। इसलिए आंकड़ों में पहली बार महिलाएं दिख रही हैं। सरकारें, कंपनियाँ और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ अब “बेशक” कह सकती हैं। लेकिन इन आंकड़ों का क्या होता है? यह महिलाओं की स्थिति को कैसे बदलता है? महिलाएं अपनी स्थिति को बदलने के लिए इसका उपयोग कैसे करती हैं? क्या अब से दस साल बाद के आंकड़े यह बदलाव दिखाएंगे? (महामारी के दौरान आंकड़े बदल गए। लिंग वेतन अंतर फिर से बढ़ गया, जिससे महिलाएं एक दशक या उससे अधिक समय पीछे चली गईं।)
इन लैंगिक दृष्टिकोणों में मामले के अध्ययन, कहानियों और महिलाओं की आवाज वाले बक्से हैं। या अधिक सटीक रूप से, एक महिला की आवाज: एक महिला जो गरीबी से बाहर निकलने के लिए या हाशिये से अपना रास्ता निकालने के लिए पर्याप्त रूप से साधन संपन्न थी। इसमें कोई शक नहीं कि यह एक संघर्ष था और हम इसका पूरा सम्मान करते हैं। लेकिन कई बार यह व्यक्तिगत महिलाओं के बारे में है। महिलाओं का समूह नहीं। सामूहिक रूप से संगठित महिलाएं नहीं। ऐसी महिलाएँ नहीं जिनकी संयुक्त शक्ति ने पुरुषों के विशेषाधिकार, शक्ति और स्थिति को बाधित किया।
ये सफलता की कहानियां बताती हैं कि कैसे महिलाओं (या एक महिला) ने लैंगिक अंतर को खत्म कर दिया और जो कुछ भी पुरुष कर रहे थे, वहां तक पहुंच गए या उससे आगे निकल गए। दोबारा, हम इसे हल्के में नहीं लेते हैं और हम इसका सम्मान करते हैं कि यह कितना कठिन है। लेकिन हम शायद ही कभी इस लिंग-आधारित दृष्टिकोण या लिंग परिप्रेक्ष्य में पुरुषों को अंतर को ख़त्म करने के लिए कुछ करते हुए देखते हैं। पुरुष स्थिर रहते हैं, जहां पुरुष हैं, वहां पहुंचने के लिए महिलाएं दस गुना अधिक मेहनत करती हैं। दूसरे शब्दों में, पुरुष पितृसत्ता के विशेषाधिकार और शक्ति को बनाए रखते हैं और महिलाओं को यह पता लगाना होता है कि उन्हें कैसे पार करना है।
मुद्दा यह है कि लिंग परिप्रेक्ष्य और लिंग आधारित दृष्टिकोण अर्थहीन हैं यदि वे शक्ति के मुद्दे को संबोधित नहीं करते हैं। विस्तार से, लैंगिक दृष्टिकोण और लिंग-आधारित दृष्टिकोण केवल तभी मायने रखते हैं जब वे मूलभूत परिवर्तन लाने के लिए महिलाओं को अपनी सामूहिक शक्ति का प्रयोग करने के लिए संगठित करने में योगदान करते हैं। लैंगिक परिप्रेक्ष्य स्थिर दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए (एक स्नैपशॉट, प्रोफ़ाइल या डेटासेट)। यह महिलाओं के प्रणालीगत और संस्थागत भेद्यता और हाशिए पर, महिलाओं के सामूहिक आत्मविश्वास और उनकी संगठित करने की क्षमता, और भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण को दूर करने के लिए महिलाओं के सामूहिक संघर्ष के बीच अंतःक्रिया की एक गतिशील प्रक्रिया होनी चाहिए।
जैसा कि मैंने कहीं और तर्क दिया है: पितृसत्ता एक रवैया नहीं है। यह महिलाओं के दमन और शोषण के लिए बनाई गई सत्ता (एक शासन व्यवस्था) की व्यवस्था है। यह जानबूझकर मज़दूर वर्ग की सामूहिक शक्ति को प्रतिबंधित करता है और हमारे संगठनों की शक्ति को कमजोर करता है। यह सांस्कृतिक नहीं है, यह राजनीतिक है।
लैंगिक परिप्रेक्ष्य और लिंग आधारित दृष्टिकोण सार्थक होने के लिए, उन्हें राजनीतिक होना चाहिए। परिणामी होने के लिए उन्हें महिलाओं की सामूहिक शक्ति को बढ़ाने में योगदान देना चाहिए।
इस संदर्भ में हमें लैंगिक दृष्टिकोण और लिंग आधारित दृष्टिकोणों को शामिल करने के लिए किसी भी दावे का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। हमें यह पूछना चाहिए कि निर्णय लेने में महिलाओं के पास अधिक शक्ति कैसे हो? कार्रवाई और उसके परिणामों दोनों को निर्धारित करने के लिए महिलाओं का अधिक नियंत्रण (संसाधनों के आवंटन और अधिकारों और प्रतिनिधित्व के प्रयोग में) कैसे होता है? महिलाएं इन लाभों को संस्थागत बनाने (लॉक इन) करने के लिए अपनी सामूहिक शक्ति का उपयोग कैसे करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि जो कुछ भी लड़ कर हासिल किया है उसे वापस नहीं छिना जा सके?
यदि अनुसंधान, नीतियों, कार्यक्रमों और राज्य के कार्यों में लैंगिक दृष्टिकोण निर्णय लेने और संसाधनों पर नियंत्रण में महिलाओं के लिए अधिक शक्ति की गारंटी नहीं देता है, तो वे केवल दृष्टिकोण हैं। बेशक तब कुछ नहीं बदलेगा, सब कुछ वैसा ही रहेगा।
